Monday, July 21, 2008

सुरक्षित अलीगढ- संरक्षित अलीगढ


बचपन में स्कूल की प्रार्थना के बाद बहुत से नारे लगते थे। इनमें से दो नारे मैं आज तक नहीं भूला हूँ। ये हैं - हम सुधरेंगे-जग मुधारेगा। देश की रक्षा कौन करेगा - हम करेंगे, हम करेंगे, हम करेंगे। ये नारे आज भी प्रासंगिक हैं। अगर हम अपना-अपना कर्तव्य ठीक से निभाते रहेंगे तो बहुत सी समस्याओं का हल स्वयमेव हो जाएगा। हम सुधरेंगे-जग सुधरेगा के पीछे भाव भी यही है।
जहाँ तक देश की बात है तो यह प्रदेश, मंडल, जिला, गांव, मोहल्ला और इनमें रहने वाले लोगों तथा उनकी मिली-जुली संस्कृति सुंदर समन्वय से बनता है। इसलिए हम सब देश का प्रतिनिधित्व करते हैं। हम जहाँ हैं, वहां सब कुछ सेफ- सुरक्षित रखना एक तरह से देश की सेवा करना है। तो आइये, अपने शहर को सेफ -सुरक्षित करके देश की सेवा में अपना हाथ बटाइए।
अपने ऐतिहासिक शहर अलीगढ को लेकर हर कोई आशंकित है। सबके मन में असुरक्षा का वातावरण घर किए रहता है। हमने बहुत बदनामी सह ली। प्रण कीजिये कि आज से, अभी से अपने अलीगढ को हर दृष्टि से सुरक्षित बनायेंगे। हम पुराने घाव नहीं कुरेदेंगे। अपने आसपास नज़र रखेंगे। कोई संदिग्ध व्यक्ति दिखाई देता है तो तत्काल निकटस्थ पुलिस थाने को सुचना देंगे। आपका नाम गुप्त रखने कि गारंटी मैं लेता हूँ। अफवाहें फैलाने को आप स्वयं फटकारें। फ़िर हम गर्व से कह सकेंगे-
''सुरक्षित अलीगढ- संरक्षित अलीगढ''
इस दिशा में आपके सुझाव सादर आमंत्रित हैं। बिना आपके सहयोग के कुछ भी संभव नहीं है। हमें बताइए कि हम क्या करें सुरक्षित अलीगढ- संरक्षित अलीगढ का सपना साकार हो सके । हमें पूरी दुनिया को बताना है कि हमारा अलीगढ हर दृष्टि से सुरक्षित है
जय हिन्द
असीम अरुण
एसएसपी, अलीगढ़

7 comments:

SAFER ALIGARH said...

महॊदय‍
अगर अलीगढ के लिए बाकइ कुछ करना है तॊ टैफिक पुलिस कॊ इस तरह के दिशा निदेश दिए जाए कि वे अपने ड्यूटी के समय सिथलता न बरते और नियम विरुद्ध ड्राइविंग करने वाले ड्राइवरॊं कॊ दंडित करने में न सकुचाए। सामान्यतः छॊटे वाहन वाले ही जाम की स्थित पैदा करते है। वहीं रिक्शा व टैम्पॊं के लिए नियत स्थान बनाया जाना चाहिए। जिससें यात्रीयॊं व वाहन चालकॊं का समय बचने के साथ परेशानी भी नहीं हॊगी।

केदार नाथ यादव
हिन्दुस्तान अलीगढ ।

हिन्दी के लिक्खाड़ said...

अलीगढ़ शहर के दामन पर दंगे का दाग लगा हुआ है। यह पता नहीं कब छूटेगा। अलीगढ़ शहर का वास्तविक विकास दंगे के कारण नहीं हो पाता है। चंद सिरफिरे लोग पूरे शहर को बदनाम किए रहते हैं। शायद इसी दाग को मिटाने का अभियान है सुरक्षित अलीगढ़-संरक्षित अलीगढ़। अप्रत्यक्ष रूप से ही सही, कोई दंगे का दाग मिटाने की बात सोच तो रहा है। इस मामले में मैं एसएसपी साहब औऱ उनकी टीम को बधाई देना चाहता हूं।
भानु प्रताप सिंह, आगरा

Anonymous said...

कप्तान सहाब नमस्कार,
आपके जज्बे, हौसले,प्रयोगधर्मिता और उसे क्रियान्वित करने की लगन को हम सलामी देते हैं। अच्छा लगता है जब अधिकार संपन्नलोग सुधार और निर्माण की पहल करते हैं। जब जब यह हुआ जनता की अपेक्षाएं भी बढीं लेकिन यह स्वाभविक है। यूं तो शहर में कई समस्याऐ हैं लेकिन अतिक्रमण एक ऐसा रोग है जिसके संबंध में कहा जा सकता है, मर्ज बढ़ता गया, ज्यों ज्यों दवा की। मैं समझ नहीं पाता कि एक बार हटाने के बाद आखिर दुवारा उस जगह पर कब्जा क्यों हो जाता है। स्थाई अतिक्रमण से अधिक समस्या अस्थाई अतिक्रमण से है। गांधीपार्क स्थित आईसीआईसीआई बैंक के बाहर सडकों पर खड़े वाहन, रामघाट रोड पर बैंक के बाहर वाहनों का जमाबड़ा और सामने ही पुलिस कर्मियों का चेकिंग में लगे रहना। बस स्टैंड के बाहर बेतरतीब खडीं बसे,व्यस्ततम बाजारों की तंग दुकानों के बाहर खडे वाहन,कुछ धार्मिक स्थलों के बाहर सालों से अड्डा जमाए खोखेबाज,शहर में दर्जनों स्थानों पर लगी ढकेलें। यह जख्म नहीं बल्कि नासूर हैं। गरीब हैं, रोजीरोटी है, कई दशकों से यहां ढकेल लगाता हूं,रसीद कटी हुई है। यही वह जुमले हैं जो इनको हटाते समय कार्रवाई करने वाले दस्ते को सुनने पड़ते हैं। लेकिन पुनर्वास नाम की भी कोई चीज होती है। विकल्प,हल, समाधान जैसै भी शब्द होते है। यह इस शहर के विरोध करने वाले नहीं जानते हैं। यह लोग भूल जाते हैं कि कभी मंगल बाजार शहर के सबसे व्यस्ततम रेलवे रोड़ पर लगा करता था। अब उसने नुमाईश मैदान में अपनी अलग कारोबारी दुनिया और संस्कृति बना ली है। जो पहले से कई गुना बेहतर है। यह समझना और समझाना ज्याद मुशकिल नहीं। चक्रधर गोवर्धन, फायर ब्रिगेड कॉलोनी, बन्ना देवी अलीगढ़।

Anonymous said...

कप्तान सहाब नमस्कार
आदिकाल से ही सुरक्षा मनुष्य की प्राथिमक जरूरत रही है। इसके लिए पहरेदारों की आदिकालीन परंपरा रही है। रात के समय जब सब सो जाते हैं उस वक्त चौकसी की जरूरत सबसे अधिक होती है। शहर का विस्तारित क्षेत्र और सीमित सुरक्षाकर्मियों की संख्या के चलते हर गली मोहल्ले में एक एक सुरक्षा कर्मी की तैनाती संभव नहीं है। क्या यह संवभ है कि शहर में ऐसे मोहल्ले और कॉलोनियां चिह्नित कर ली जाएं जिनको गेट बंद रिहाईश में तब्दील किया जा सकता है। एक मोहल्ले की कुछ गलियों में गेट लगा दिए जाएं। दिन के समय सभी गेट खुले रखे जाएं। रात के समय केवल एक ही गेट खोला जाए। साथ ही आने जाने वालों का विवरण भी दर्ज किया जा सकता है। ---चक्रधर गोवर्धन, फायर ब्रिगेड कॉलोनी बन्ना देवी अलीगढ़।

Anonymous said...

असीम सर नमस्कार,
अगर कुल्हा़ड़ी में लकड़ी का दस्ता न होता
तो दरख्त के कटने का रस्ता न होता

इधर तो एसपी सिटी साहब रविवार को ओपन बारों के खिलाफ अभियान चला रहे थे, दूसरी ओर थाना बन्ना देवी पुलिस ने ही जेल रोड पर मेहर पैलेस के सामने चलने वाले ओपन बारों पर सूचना लीक कर दी कि सब कुछ ठीक कर लो साबह आ रहे हैं। पांच मिनट में ही वहां पर मौजूद डेढ़ दर्जन लोगों ने बची हुई शराब गटक ली। और चने खाने लगे...ऐसे बैठ गए कि जैसे सत्संग में आए हों..क्या याराना है साहब। ये इनायतें नहीं बे बजह...

राकेश मैनोश, बृज बिहार कॉलोनी, एडीए, सुरक्षा विहार, अलीगढ़

Anonymous said...

कप्तान सहाब नमस्कार
मुझे पता चला कि आपकी तबीयत खराब हो गई थी। मैं भगवान से प्रार्थना करता हूं कि वह आपको स्वस्थ रखे। जिससे इस जिले को आपकी बेहतर सेवाएं मिल सकें। मनीष शर्मा अशोक नगर....

हिन्दी के लिक्खाड़ said...

सुरक्षित अलीगढ़-संरक्षित अलीगढ़ को आम जनता के बीच कब तक ला रहे हैं एसएसपी साहब। शहर में हो रही घटनाओं के मद्देनजर इस अभियान को तत्काल शुरू करने की जरूरत है।

सादर,
भानु प्रताप सिंह